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Archive for August, 2010

चंदा से झरती झिलमिल रश्मियों के बीच एक अधूरी मखमली सी ख्वाइश का सुनहरा बदन होले से सुलगा दो ना इन पलकों में जो ठिठकी है उस सुबह को अपनी आहट से एक बार जरा अलसा दो ना बेचैन उमंगो का दरिया पल पल अंगडाई लेता है आकर फिर सहला दो ना छु कर के [...]

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