“भ्रम”

कल्पना की सतह पर आकर थमा,
अनजान सा किसका चेहरा है…..
शब्जाल से बुनकर बेजुबान सा नाम,
क्यूँ लबों पे आकर ठहरा है….
एहसास के अंगारे फ़िर जलने लगे,
उदासी की चांदनी ने किया घुप अँधेरा है….
क्षतिज के पार तक नज़र दौड़ आई,
किसके आभास का छाया कोहरा है……
वक्त की देहलीज पर आस गली,
कितना बेहरम दर्द का पहरा है…..
साँस थम थम कर चीत्कार कर रही,
साँस थम थम कर चीत्कार कर रही,
कोई नही.. कोई नही ..ये भ्रम बस तेरा है…..




