“ज़ख्म -ऐ -दिल”
ज़ख्म-ऐ-दिल दिखा नही सकते,
तेरा खंजर चुभा हुआ होगा..
तेरा खंजर चुभा हुआ होगा..
आज की रात जागते गुजरी,
दर्द फिर से बढ़ा हुआ होगा…
दर्द फिर से बढ़ा हुआ होगा…
आज तक रास्तों में बैठे हैं,
जिन से तेरा गुज़र हुआ होगा…
जिन से तेरा गुज़र हुआ होगा…
इतना खामोश क्यूँ है तू हमदम,
आज मुझ से खफा हुआ होगा….
आज मुझ से खफा हुआ होगा….
अब तेरे ख़त भी कम ही आते हैं,
तेरी तबियत में कुछ हुआ होगा …
तेरी तबियत में कुछ हुआ होगा …
सीमा क्यूँ आँख नम हैं तेरी आज,
कोई दुःख है तुझे हुआ होगा….





ultimate hai g