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Archive for September, 2008

जूनून

 

एक वादा ,
उसके लौट आने का,
एक “जूनून” मेरा
निगाहें बीछाने का“

वो सितमगर है

झुठ बोल जाएगा

मेरी खामोशियों से
” मगर”
जिन्दगी भर सदायें पायेगा

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“कभी आ कर रुला जाते”

दिल की उजड़ी हुई बस्ती,कभी आ कर बसा जाते
कुछ बेचैन मेरी हस्ती , कभी आ कर बहला जाते…

युगों का फासला झेला , ऐसे एक उम्मीद को लेकर ,
रात भर आँखें हैं जगती . कभी आ कर सुला जाते ….
दुनिया के सितम ऐसे , उस पर मंजिल नही कोई , [...]

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दस्तक

अपने ही साये से ,

“आज”

खौफजदा से हैं,

फ़िर किसी तूफ़ान ने,

दस्तक दी होगी…………..

-दिले – मुजतर के दाग की,
“रोशनी गहरी”
हाजत कहाँ सियाह रात मे ,
महे- ताबां ठहरी

(दिले – मुजतर – बेचैन दिल,
हाजत – जरूरत ,
महे- ताबां – चमकते चाँद )

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अमानत

अमानत

अमानत मे अब और खयानत ना की जाए ,
आहें-शरर -फीशां आज उन्हें लौटाई जाए…

हिज्र-ऐ-यार मे जो हुआ चाक दामन मेरा,
दरिया-ऐ-इजतराब उनके सामने ही बहाई जाए

(आहें-शरर -फीशां – चिंगारियां फैंकने वाली आहें
हिज्र-ऐ-यार – प्रेमी का विरह
दरिया-ऐ-इजतराब- बेचेनी का दरीया)

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“पहचान”

नाम से हुई पहचान हमारी ,

या हमसे नाम का उन्वान हुआ,
बडी पशोपेश मे रही जिन्दगी,
क्या आगाज़ हुआ और,
क्या अंजाम हुआ ???

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“मंजिल”

मंजिल

मंजिल नहीं थी कोई मगर गामज़न हुए
ख़ुद राह चुन के तेरी तमन्ना लिए हुए

फिर साया मेरा देके दगा चल दिया किधर
हम आईने को तकते रहे जाने किस लिए

दिलदार ने भुला दिया पर हमने उसको यूँ
सजदे सुकून-ऐ-दिल के लिए कितने कर लिए

अल्फाज़ धोका दे गए जब आखिरश हमें
हमने भी उम्र [...]

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सजा

“सजा”

आज ख़ुद को एक बेरहम सजा दी मैंने ,
एक तस्वीर थी तेरी वो जला दी मैंने
तेरे वो खत जो मुझे रुला जाते थे
भीगा के आंसुओं से उनमे भी,
” आग लगा दी मैंने …”

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कैसे भूल जाए

 
जिन्दगी की ढलती शाम के ,
किसी चोराहे पर,
तुमसे मुलाकात हो भी जाए…
“वो दर्द-ऐ-गम”,
तेरे लिए जो सहे मैंने,
उनको दिल कैसे भूल जाए…

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“फर्जे-इश्क “
बेजुबानी को मिले कुछ अल्फाज भी अगर होते
पूछते कटती है क्यूँ आँखों ही आँखों मे सारी रात ..,
सनम-बावफा का क्या है अब तकाजा मुझसे ,
अपना ही साया है देखो लिए पत्थर दोनों हाथ ….
पेशे-नजर रहा महबूब-ऐ-ख्याल गोश-ऐ-तन्हाई मे,
आईना क्यूँ कर है लड़े फ़िर मुझसे ले के तेरी बात…
दिले-बेताब को बख्श दे अब तो [...]

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“तलब”
ख़ुद को आजमाने की एक ललक है ,
एक ग़ज़ल तुझ पे बनाने की तलब है…
लफ्ज को फ़िर आसुओं मे भिगो कर,
तेरे दामन पे बिछाने की तलब है …
आज फ़िर बन के लहू का एक कतरा,
तेरी रगों मे दौड़ जाने की तलब है …
अपने दिल-ऐ-दीमाग से तुझ को भुलाकर,
दीवानावार तुझको याद आने की तलब है…
दम [...]

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“तेरी चाहत”

“तेरी चाहत”
तेरी हर अदा पे मुझे बस प्यार आता है,
जब मेरे साथ तू होती है करार आता है …
तेरी आँखें है सनम, या के हैं जाम-ऐ-शराब,
तेरी नज़रों को मैं देखूं तो खुमार आता है…
तू मेरे सामने है, ख्वाब हो , बेदारी हो,
अपनी बांहों में लिए तुझ को चला जाता हूँ …
तुझ से मिलने [...]

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9/22/2008

“तस्सली”
“तस्सली”

रात भर जागी आँखों को,
ऐ काश वो तस्सली देता,
“हम सोये क्युं नही” जो
एक बार ही पूछा होता…….

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मेरे पास

“मेरे पास”

रूह बेचैन है यूँ अब भी सनम मेरे पास,
तू अभी दूर है बस एक ही ग़म मेरे पास
रात दिन दिल से ये आवाज़ निकलती है के सुन
आ भी जा के है वक्त भी कम मेरे पास
तू जो आ जाए तो आ जाए मेरे दिल को करार,
दूर मुझसे है तू दुनिया के सितम [...]

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“शबे-फुरकत”

“शबे-फुरकत”
” शबे-फुरकत थी ,
“और”
जख्म – पहलु में,
कोहे – गम ने की ,
शब- बेदारीयाँ हमसे…
(शबे फुरकत- विरह की रात ,

कोहे – गम- दुःख का पहाड़ ,
शब – बेदारीयाँ – रात को जागना )

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“जूनून-ऐ-इश्क”

“जूनून-ऐ-इश्क “
जूनून की बात निकली है तो मेरी बात भी सुन लो,
जूनून-ऐ-इश्क सच्चा है तो फिर हारा नहीं करता
मुक़द्दस है जगह वो क्यूंकि घर माशूक का है वो,
कोई मजनूँ कभी भी अपना दिल मारा नहीं करता
तजस्सुस यह के वोह बोलेगा सच या झूट बोलगा,
जूनून में रह के कोई काम यह सारा नही करता
वो मजनू है [...]

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“अपलक”
“अपलक”

बिना झपकाए मैं,
अपलक देखूं,
तुम को देखने की,
अपनी ललक देखूं

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तुम्हारी याद है

एक तरफ़ तुम हो तुम्हारी याद है,
दूसरी जानिब ये दुनिया है कोई बरबाद है,
तीसरी जानिब कोई मासूम सी फरियाद है .

वस्ल के लम्हों में भी तनहा रहे,
तुम को गुज़रे वक्त याद आते रहे,
तुम से मिल कर भी तो दिल नाशाद है ……

दर्द-ओ-गम की ताब जो न ला सके,
वो कहाँ दिल को कहीं बहला [...]

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Thursday, September 18, 2008

खुदगर्ज

 

उसकी खैरियत की ख़बर हो जाती मुझको,
एक बार अगर मेरे हालत का जयाजा लेता…
बडा ही “खुदगर्ज” रहा था वो हर तकाजे मे,
“मुझे गुमान हो उसकी सलामती का भी “
वो कैसे मगर इतना भी मेरा एहसान लेता?

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“रश्क “

 

तबीयत की बेदिली के अंदाज पे,
अब रश्क क्या करें ???
छोटी सी बात पे तोड़ के उनसे रिश्ता ,
बहते रहें अब अश्क क्या करें ???

(रश्क- दुख, गिला)

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“दावा बेगुनाही का”

 
 

दीवाना-ऐ-बेबाक को,
ख्याल कहाँ दिले-तबाही का
कूचा-ऐ-यार में शिरकत,
दीवाना-वार हर हरकत
और दावा बेगुनाही का

(दीवाना-ऐ-बेबाक- निडर प्रेमी )
(कूचा-ऐ-यार- प्रेमिका की गली)

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9/16/2008

“इंतजार का लम्हा”

इंतजार का लम्हा

इंतजार का लम्हा यूँ भी,
क्या किसी ने देखा होगा
बेखुदी मे सीने की जगह,
“दिल”
जब आंख मे धड़का होगा… ?????

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“निगाहे-नाज़”

 

“निगाहे-नाज़”
बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
अंधेरी रात मे भी,
” रोशन रूखे- यार देखा”
शायद ये निगाहे-नाज़ की
 बीमारी थी
(बेज़ारी – उदासीनता )
(रूखे- यार – प्रेमिका का चेहरा)
(निगाहे-नाज़ – चंचल आँख)

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9/12/2008

“आंख भर के”

ना आंख भर के देखा ही किए ,
ना सरगोशीयों की कोई बारात थी ,
मुद्दत से जिसकी तडपते रहे

क्या ये वही मुलाकत थी …????

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“आशनाई “

‘नज़र से नज़र”
कभी मिलाई तो होती….
दिल की बात कभी हमसे भी,
बनाई तो होती….
क्यूँ कर रही शबे-फुरकत से’
आशनाई सारी रात…..
कभी मेरी तरह अंधेरों मे,
“आईने से आंख लडाई तो होती “
(शबे फुरकत- विरह की रात )

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9/10/2008

“दरिया की कहानी “
 

चश्मे-पुरआब के आगे,
क्या होगी किसी दरिया की रवानी,
रु-ऐ-चश्मतर के आगोश मे पढ़ ले,
हर दरिया की कहानी

(रु-ऐ-चश्मतर- भीगी आंख)
(चश्मे-पुरआब- आंसू भरी आँख)

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