“क्यों है”
“क्यों है”
तेरे बगेर तनहा जिन्दगी मे मेरी कुछ कमी सी क्यों है ,
तेरी हर बात मेरे जज्बात से आज फ़िर उलझी सी क्यों है…
तु मुझे याद ना आए ऐसा एक पल भी नही संवारा मैंने,
गुजरते इन पलों मे मगर आज फ़िर बेकली सी क्यों है……
बेबसी के लम्हों मे आंसुओं का वो मंजर गुजारा मैंने ,
उठती गिरती पलकों मे मगर आज फ़िर कुछ नमी सी क्यों है………
मोहब्बत मे तेरा नाम लेकर तेरी बेरुखी को भी रुतबा दिया मैंने,
हर एक आहट पे तेरे आने की उम्मीद आज फ़िर बंधी सी क्यों है……….
गिला तुझसे नही बेवफा सिर्फ़ अपनी मज्बुरीयों से किया मैंने,
वक्त से करके तकरार इन सांसों की रफ्तार्र आज फ़िर थमी सी क्यों है……








apka blog pehali baar dekha….sunder hai
Kavita aur bhi khoobsurat..
मोहब्बत मे तेरा नाम लेकर तेरी बेरुखी को भी रुतबा दिया मैंने,
हर एक आहट पे तेरे आने की उम्मीद आज फ़िर बंधी सी क्यों है……….
bahut sunder bhav hain
sunder rachna
bahut hi acchi lagi aapki ye rachna bhi, lagta hai aapko no. (1) ka khitab de hi dena chhiye.
‘fir’ nahiin baba ‘phir’ hota hai…
andaaz kaafii achchha hai!