“वो ”
March 17, 2008 by limit
“वो “
“वो “
मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपते हैं वो.
मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा जिसने,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
हाले यार समझ ना सके अब तलक जिनका,
मेरे दिल पे सर रख कर हाले दिल सुनाते हैं वो.
जिक्र चलता है जब जब मोहब्बत का जमाने मे,
मेरा नाम अपने लब पर लाकर बुदबुदाते हैं वो.
मुझसे मिलने मे बदनामी का डर था जिनको,
छोड़ कर सारी हया मेरी कब्र पे दौडे चले आतें हैं वो.
उनके गम का सबब कोई जो पूछे उनसे ,
दुनिया को मुझे अपना आशिक बतातें हैं वो,
कहे जो उनसे कोई पहने शादी का जोडा वो,
मेरी मिट्टी से मांग अपनी सजाते है वो.
मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपते हैं वो.








Beautiful and very touching.
You are simply great.
Congratulations to you on writing such a good and touching poems. Please keep me sending such good collections of your poem.
yah bhi bhaav bhari prastuti seema—-aur chitra to bahut hi sundar hain!
lekin tum pahli panktiyon mein shayad mistake typing ki–wo check karna-क्यों मुझे तडपते हैं वो.
mein ‘tadpaaate’ hona chaheeye?hai na?